Sunday, July 1, 2012

Fwd: Most urgent :- वाराणसी जिले के थाना आदमपुर पुलिस के द्वारा माफिया के ना मिलने पर उसके भाई को गिरफ्तार करने के सम्बन्ध मे।



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From: Detention Watch <pvchr.adv@gmail.com>
Date: 2012/6/3
Subject: Most urgent :- वाराणसी जिले के थाना आदमपुर पुलिस के द्वारा माफिया के ना मिलने पर उसके भाई को गिरफ्तार करने के सम्बन्ध मे।
To: Anil Kumar Parashar <jrlawnhrc@hub.nic.in>, akpnhrc@yahoo.com
Cc: lenin@pvchr.asia, Lenin Raghuvanshi <pvchr.india@gmail.com>, shruti@pvchr.asia



                                                                                                                     दिनांक - 03 जून, 2012.
सेवा मे,
           श्रीमान अध्यक्ष महोदय,
           राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग,
           नई दिल्ली - भारत !
 
विषय : उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले मे थाना आदमपुर पुलिस के द्वारा माफिया के ना मिलने पर उसके भाई को गिरफ्तार करने के सम्बन्ध मे।

महोदय,

आपको यह अवगत कराना चाहता हू कि वाराणसी जिले के आदमपुर थाना की पुलिस ने एक माफिया को पकडने के लिये दबिश दी लेकिन वह माफिया के ना मिलने पर पुलिस वाले ने उसके छोटे भाई छोटू को उसके घर से उठा ले गयी और पिछले 3 दिनो से उसे थाने मे बैठाई हुयी है तथा किसी से मिलने नही दे रहे है. किसी भी अनहोनी घटना होने की आशंका है।

      अतः आप से अनुरोध है कि कृपया इस मामले को संज्ञान मे लेते हुये इस पर त्वरित कार्यवाही का आदेश दे ताकि एक निर्दोष के मानवाधिकार का संरक्षण हो सके और गिरफ्तारी, हिरासत और पूछ्ताछ के सन्दर्भ मे डी.के. बसु बनाम प. बंगाल के निर्देशो को धज्जिया उडाने वाले दोषी थाना पर कानूनी कार्यवाही करने की कृपा करे !

 

  

भवदीय
 
डा0 लेनिन,
(महासचिव)
 
मानवाधिकार जननिगरानी समिति,
सा 4/ 2 ए. दौलतपुर, वाराणसी - 221002
 
मो. - +91-9935599333.
ई - मेल - lenin@pvchr.asia,
 
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Upendra Kumar
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Sa 4/2A, Daulatpur, Varanasi,
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Fwd: NHRC-RCT



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From: Detention Watch <pvchr.adv@gmail.com>
Date: Sun, Jun 3, 2012 at 8:39 PM
Subject: Fwd: NHRC-RCT
To: pvchr.adv.india@blogger.com





Case Details of File Number: 11077/24/72/2010-BL

Diary Number 32940
Name of the Complainant LENIN RAGHUVANSHI, BAMS MEMBER
Address DISTRICT VIGILANCE COMMITTEE, ON BONDED LABOUR, SA 4/2A, DAULATPUR,
VARANASI , UTTAR PRADESH
Name of the Victim VINOD MUSAHAR S/O VISHWANATH MUSHAR & OTHERS
Address R/O VILL- JAMUAI, PO- LAHUAN, PS- DEOGAON,
AZAMGARH , UTTAR PRADESH
Place of Incident 'R' MARKA BRICKS KILN, KASHIPU
VARANASI , UTTAR PRADESH
Date of Incident 3/11/2010
Direction issued by the Commission These proceedings shall be read in continuation of the earlier proceedings of the Commission dated 5.10.2011. On 5.10.2011 the Commission observed and ordered: Let a copy of the complaint filed by Sh. Lenin Raghuvanshi along with the affidavit be sent to the District Magistrate, Varanasi with the direction to cause an enquiry by an officer subordinate to him under the Bonded Labour System (Abolition) Act, 1976and submit report within six weeks. Pursuant to the directions of the Commission a letter was issued to District Magistrate, Varanasi on 14.10.2011 but no report submitted. Let a final reminder be issued to District Magistrate, Varanasi to submit report within six weeks failing which Commission shall be compelled to initiate proceedings under Section 13 of the Protection of Human Rights Act 1993.
Action Taken Additional Information Called for (Dated 3/20/2012 )
Status on 6/2/2012 Response from concerned authority is awaited.

 

Case Details of File Number: 9808/24/72/2010

Diary Number 29161
Name of the Complainant LENIN RAGHUVANSHI, B.A.M.S. MEMBER
Address DISTRICT VIGILANCE COMMITTEE ON BONDED LABOUR, SA 4/2A, DAULATPUR,
VARANASI , UTTAR PRADESH
Name of the Victim PARVATI W/O LAKSHMAN MUSHAR & OTHERS
Address AS ABOVE
VARANASI , UTTAR PRADESH
Place of Incident LABH MARKA BRICK KILN,LAKSHIRA
VARANASI , UTTAR PRADESH
Date of Incident 1/1/1991
Direction issued by the Commission The grievances raised in this complaint relate to the matter, which is a subject of the State. Let the complaint be transferred to the Uttar Pradesh State Human Rights Commission u/s 13 (6) of the Protection of Human Rights Act, 1993, as amended by the Protection of Human Rights (Amendment) Act, 2006, for disposal in accordance with the provisions of the Act. 2. In the meantime, notice be issued to the concerned SP/SSPs,requiring him to conduct inquiry and submit report as the allegations contained in the complaint appear to be serious in nature. The report should positively be submitted to the Uttar Pradesh State Human Rights Commission within four weeks.



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Fwd: उत्तर प्रदेश के बदायू जनपद के लालपुर पुलिस चौकी मे 17 वर्षीय किशोरी के साथ बलात्कार के सन्दर्भ मे !



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From: Detention Watch <pvchr.adv@gmail.com>
Date: 2012/5/29
Subject: उत्तर प्रदेश के बदायू जनपद के लालपुर पुलिस चौकी मे 17 वर्षीय किशोरी के साथ बलात्कार के सन्दर्भ मे !
To: complaintcell-ncw@nic.in, ncw@nic.in
Cc: lenin@pvchr.asia, Lenin Raghuvanshi <pvchr.india@gmail.com>


                                                                                                                     दिनांक - 29 मई, 2012.
सेवा मे,
           श्रीमान अध्यक्षा महोदया,
           राष्ट्रीय महिला आयोग,
           नई दिल्ली - भारत !
 
विषय -  उत्तर प्रदेश के  बदायू जनपद के लालपुर पुलिस चौकी मे 17 वर्षीय किशोरी के साथ बलात्कार के सन्दर्भ मे !
 
महोदया,
         हम आपका ध्यान उत्तर प्रदेश के  बदायू जनपद के लालपुर पुलिस चौकी की ओर आकृष्ट कराना चन्हुंगा, जहा 17 वर्षीय किशोरी के साथ पुलिस के मुखबिर व वहा उपस्थित सिपाही का दोस्त ने उसे अपनी हवस का शिकार बना डाला  और वही  सिपाही घटना के वक्त पुलिस चौकी के गेट पर खडा होकर पहरा देता रहा ! 
 
         पीडिता किशोरी रामपुर जिले के खजुरिया थाना अंतर्गत गांव कायमगंज  की निवासनी है, जो बडे सरकार की दरगाह पर जियारत करने आयी थी ! रात होने पर वह अपने वृद्ध रिश्तेदार के साथ एक तख्ते पर सो गयी, उसी दौरान सम्बन्धित पुलिस चौकी के गश्ती करते सिपाही गण पहुंच गये और चौकी ले आये ! पुलिस किशोरी और रिश्तेदार के छोडने के एवज मे 20 हज़ार रूपय्रे की मांग भी रखा था !
 
 
 
           विदित हो की जिन लोंगो पर जाय्ररीन की सुरक्षा का जिम्मा था, वे ही समाज मे असुरक्षा और अवयवस्था को जन्म देते है ! इस तरह की मामला हमेशा सुनने और देखने को मिलती है !
 
           अत: आप से अनुरोध है की मामले मे त्वरित हस्तक्षेप करते हुए सम्भावित दोषियो के खिलाफ न्यायोचित कानूनी कार्यवाही की जाए, एवम पीडिता व गवाहो को सुरक्षा तथा मुआवजा  प्रदान कराने का आदेश पारित करने के साथ मामले मे उच्चस्तरीय जांच कराने की कृपा करे !  
 
भवदीय
 
डा0 लेनिन,
(महासचिव)
 
मानवाधिकार जननिगरानी समिति,
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बदायूं : उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले में शर्मसार कर देने वाली घटना में पुलिस चौकी में एक नाबालिग लड़की से कथित रूप से बलात्कार किया गया। इस मामले में तीन पुलिसकर्मियों को निलम्बित करके गिरफ्तार कर लिया गया है।

पुलिस अधीक्षक रतन कुमार श्रीवास्तव ने आज यहां बताया कि रामपुर की रहने वाली 17 वर्षीय लड़की कल अपने नाना इकराम अली के साथ 'बड़े सरकार' की मजार पर चादर चढ़ाने आयी थी। रात ज्यादा हो जाने पर वह मजार परिसर में ही ठहर गए। उन्होंने बताया कि इसी बीच वहां शहर कोतवाली अंतर्गत लालपुल पुलिस चौकी पर तैनात पुलिसकर्मियों ने इकराम अली और उसकी नातिन को कथित रूप से आपत्तिजनक स्थिति में देखा और दोनों को चौकी परिसर में ले गये। बाद में वे पुलिसकर्मी गश्त पर चले गए।

श्रीवास्तव ने बताया कि रात करीब तीन बजे सुमित नामक पुलिस रंगरूट अपने साथी गोपाल के साथ आया और रिहाई के लिये अली से कथित रूप से धन मांगा जिसमें असमर्थता जताने पर गोपाल उस लड़की को पुलिस चौकी के अंदर बने कमरे में ले गया और सुमित बाहर से दरवाजे की कुंडी लगाकर पहरे पर बैठ गया। उन्होंने बताया कि कमरे में लड़की के चीखने की आवाज सुनकर आसपास मौजूद स्थानीय लोग पहुंच गये और गोपाल तथा सुमित को पकड़ लिया।

श्रीवास्तव ने बताया कि इस मामले में सुमित, पुलिस चौकी में तैनात सिपाहियों औसाफ अली और माजिद तथा बलात्कार के आरोपी गोपाल को गिरफ्तार कर लिया गया है। उन्होंने बताया सुमित, औसाफ अली और माजिद को निलम्बित कर दिया गया है। श्रीवास्तव ने बताया कि पीड़ित लड़की को चिकित्सीय परीक्षण के लिये भेजा गया है। (एजेंसी)
 
बदायूं की पुलिस चौकी में किशोरी से रेप
•अमर उजाला ब्यूरो
बदायूं। रामपुर के एक गांव से आई एक किशोरी के साथ रविवार की रात लालपुल की पुलिस चौकी में एक युवक ने बलात्कार किया। युवक सिपाही का दोस्त बताया गया है। युवती बड़े सरकार की दरगाह पर जियारत करने आई थी। हादसे की खबर लगते ही लोग जुट गए और रात ही में पुलिस चौकी घेर ली। हंगामा सोमवार सुबह तक चलता रहा। एसपी के आदेश पर दो सिपाहियों और एक रंगरूट को निलंबित कर गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस ने तीनों के साथ ही रेप के आरोपी युवक को भी गिरफ्तार कर चारों को न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया।
हादसे का शिकार किशोरी अपने रिश्ते के नाना (मां के खालू) के साथ रामपुर के एक गांव से यहां आई थी। रविवार रात उसके रिश्ते के नाना और किशोरी बड़े सरकार की दरगाह परिसर में एक ही तख्त पर सोए थे। वहां दूसरे जायरीनों को दोनों को साथ सोने पर कुछ संदेह हुआ तो उन्होंने शोर मचा दिया। इसी दौरान पुलिस चौकी के गश्ती सिपाही माजिद हुसैन, औसाफ अली एवं सुमित के अलावा उसका दोस्त गोपाल निवासी मोहल्ला ब्राह्मपुर वहां पहुंच गए। सिपाही दोनों को चौकी ले आए। आरोप है कि पुलिस ने किशोरी और उसके रिश्तेदार को छोड़ने के लिए 20 हजार रुपये मांगे। रुपये नहीं देने पर दोनों को चौकी में बैठाए रखा गया।
सिपाही माजिद और औसाफ रात करीब 12 बजे फिर गश्त पर चले गए। इसी दौरान रंगरूट सुमित की मौजूदगी में उसके दोस्त गोपाल ने चौकी के ही कमरे में किशोरी के साथ बलात्कार किया। सोमवार को सुबह 11 बजे लालपुल पुलिस चौकी के सामने भीड़ ने रास्ता जाम कर दिया। एसपी रतन श्रीवास्तव के आदेश पर पीड़ित किशोरी की तहरीर पर सदर कोतवाली में आरोपियों के खिलाफ मुकदमा पंजीकृत कराया गया।











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Upendra Kumar
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Thursday, June 28, 2012

26 जून अंतर्राष्ट्रीय यातना विरोधी दिवस - एक प्रस्तुतीकरण (पुरुषवादी समाज उनके कामों को काम नहीं मानता, उनके कामों के लिए मेहनताना का भी रिवाज नहीं है. तब पुरुषों को लगता है कि वे महिलाओं का भरण पोषण कर रहे हैं. )

पुरुषवादी समाज उनके कामों को काम नहीं मानता, उनके कामों के लिए मेहनताना  का भी रिवाज नहीं है. तब पुरुषों को लगता है कि वे महिलाओं का भरण पोषण कर रहे हैं.  

किसी को शारीरिक या मानसिक कष्ट देना ही यातना है. सभ्यता के इस दौर में जब सभी अपने स्वार्थों के वशीभूत हैं, अपने लाभ के लिए सामने वाले के हित अनहित का विचार त्याग चुके हैं तो निश्चित ही एक ऐसी संवेदन हीनता जन्म लेगी  जिसमें लोग दुसरे को कष्ट पहुंचाने को कुछ बुरा नहीं मानेंगे. समय के इस दौर का मतलाब कदापि नहीं है कि हमारा इतिहास यात्नास्पद व्यवहारों से शुन्य रहा हो.. यातना का एक लम्बा इतिहास रहा है . जो कमजोर रहे हैं वे यातना को सहने के लिए आदि काल से ही अभिशप्त रहे हैं. किन्तु अपने लाभ-लोभ के लिए अपने ही भाई बंधुओं को कष्ट देना मनुष्यता नहीं है. मनुष्य है वही जो मनुष्य के लिए मरे ,- जबकि यातना का इतिहास बतलाता है कि मनुष्य दूसरों के लिए मरेगा क्या अपने के लिए दूसरों को मारने में उद्धत है.
यातना शोषकों का हथियार रहा है . वह इसके द्वारा जहाँ शोषितों को शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर करते हैं वहीँ अपनी आक्रामक सत्ता का नंगा नाच भी दिखाते है . यातना वही सहते हैं जो किसी ना किसी रूप से मजबूर और विवश हैं, उनकी विवशता उन्हें चुप रहने को मजबूर करती है तो उनकी चुप्पी शोषकों के इरादों और हौसलों को मजबूत बनाती है.. किसी भी समाज में यातना का जुल्म महिलाओं और बच्चों पर अधिक चलता है.. महिलायें घरेलू परिवेश में पुरुषों पर निर्भर रहकर उनके जोरो  जुल्म को झेलती हैं. यद्यपि वे घर में लगातार कामों में जुटी रहती हैं ,किन्तु पुरुषवादी समाज उनके कामों को काम नहीं मानता, उनके कामों के लिए मेहनताना  का भी रिवाज नहीं है. तब पुरुषों को लगता है कि वे महिलाओं का भरण पोषण कार रहे हैं. यह पुरुषवादी अहं नारियों को निचा समझता है और उन्हें यातना का भागी बनाने में नहीं झिझकता, इसके अलावा कई ऐसे रीति-रिवाज औए व्यवस्था के घिनौने रूप हैं जिसके कारण महिलायें यातना का शिकार बनती है. इसी तरह बच्चे भी यातना का शिकार बनते हैं. बाल- मजदूरी के अभिशप्त बच्चे तो इसमें शामिल हैं ही , अच्छे भले घर के बच्चे भी किसी न किसी रूप में शारीरिक अथवा मानसिक यातना को झेलते हैं. जिन घरों में पति पत्नी के बीच तनाव रहता है उस घर के छोटे बच्चे भी उस तनाव को महसूस करते हैं, यह तनाव उनके विकास शील व्यक्तित्व को तोड़ने  का काम करता है.
यह जरुरी है कि यातना का विरोध किया जाए. यह भी निश्चित है कि यातना कोई सहता नहीं उसकी मजबूरी उसे सहमे को विवश करती है.  मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है . समाज का काम सुरक्षा देना ही है.. हम सामाजिक तभी कहला सकते हैं जब सभी की सुरक्षा को महत्त्व दें..इस लिहाज से सभी का यह कर्तव्य है कि यातना और शोषण मुक्त समाज के निर्माण में अपना सहयोग दें..
लेख - अस्मुरारी नन्दन मिश्रा
सम्पर्क :-
asmuraribhu@gmail.com

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Thursday, June 7, 2012

How testimony useful for human being


The outcomes of testimony create compassion & warmth in personality among community. Today, all class, caste & religious people presents their hitch with emotion through testimony and wants justice.

Now a day every communities wants their rights and to re – establish it fully by help of testimony.

In society many people works mainly in development sector, by seeing I can say that dalit & minority people should grow but they cannot be done by getting rights. They may think that by economical empowerment they get civil rights but the present situation of our country it cannot be happen anymore.

There is silence in every expression; it indicates how inhabitants are panic. Silence takes place because of scariness.

“Scariness is the mother of silence, lacking of awareness & consciousness about rights, civil rights is similar to soul without body. It is as similar as like urgency is the mother of corruption. Without patience, self organize harmony & group initiation, corruption cannot be bunged.

Monday, June 4, 2012

उन्हें आलीशान बंगले क्यों चाहिए

http://epaper.amarujala.com/svww_zoomart.php?Artname=20120603a_008100003&ileft=18&itop=575&zoomRatio=130&AN=20120603a_008100003

उन्हें आलीशान बंगले क्यों चाहिए

जब भी मुश्किलों का मौसम आता है देश में, हमारे राजनेताओं की एक ही प्रतिक्रिया होती है। घड़ियाली आंसू बहाना। एक जमाना था, जब भारत की जनता जाहिल, नादान और नासमझ थी, तो बहल जाती थी आसानी से नेताजी के घड़ियाली आंसुओं को देखकर। अब वह जमाना नहीं रहा। जनता न जाहिल है, न इतनी नादान, सो अच्छी तरह समझती है कि तेल की बढ़ती कीमतों को लेकर भारत बंद बुलाने से उनका कोई फायदा नहीं होता है। न महंगाई कम होती है और न ही किसी और तरह का लाभ मिलता है उनको। दिहाड़ी पर जो मजदूर काम करते हैं हमारे महानगरों में, उनके लिए तो बंद का सीधा असर पड़ता है पेट पर, लेकिन नुकसान सबका होता है और कीमत अदा करनी पड़ती है देश की अर्थव्यवस्था को। इसलिए पिछले सप्ताह का भारत बंद बेमतलब था सिवाय उन राजनीतिक दलों के लिए, जो दिखाना चाहते थे कि आम आदमी के लिए उन्हें कितनी हमदर्दी है। वही घड़ियाली आंसू बहाने वाली बात। वास्तव में होगी अगर हमदर्दी या जरा-सी संवेदनशीलता, तो कुछ असली परिवर्तन लाकर दिखाते हमारे राजनीतिक दल।

असली परिवर्तन के लिए इससे अच्छा समय नहीं हो सकता। मंदी जब फैल रही है तेजी से अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में, तो क्या हमारे राजनेताओं का फर्ज नहीं बनता कुछ अपने घरेलू खर्चे कम करने का? और कम हो सकते हैं आसानी से, अगर एक-दो अहम कदम फौरन उठाए जाएं। पहला कदम तो यह होना चाहिए कि सरकारी आवास सांसदों, राजनेताओं और अधिकारियों के लिए उपलब्ध करने की प्रथा बंद कर दी जाए। यकीन मानिए कि कोई भी दूसरा लोकतांत्रिक देश नहीं है दुनिया में, जहां जनता खुद बेघर है, झुग्गी-बस्तियों में रहने पर मजबूर है, लेकिन इतनी दयालु है कि अपने राजनीतिक प्रतिनिधियों के लिए उपलब्ध कराती है महलों जैसे घर महानगरों के सबसे महंगे रिहायशी इलाकों में। दिल्ली में तो तकरीबन पूरी तरह से कब्जा कर लिया है भारत सरकार ने शहर के लुटियंस हिस्से पर, जहां जमीन के दाम एक सौ पचास करोड़ रुपये प्रति एकड़ है। इतना महंगा है लुटियंस दिल्ली में रहना कि यहां राजनेताओं और आला अधिकारियों के अलावा सिर्फ देश के सबसे अमीर उद्योगपति रहते हैं। लेकिन इन उद्योगपतियों के महलनुमा मकान उतने आलीशान नहीं हैं, जितने मंत्रियों और मंत्रालयों में उच्च स्तर के सचिवों के हैं। यह कैसी लोकतांत्रिक प्रथा है? कैसा समाजवाद? इन मकानों का अगर भारत सरकार सही मासिक किराया देने को तैयार होती है, तो एक मकान का किराया 20-30 लाख से कम नहीं पड़ता। समाजवाद का ढिंढोरा पीटने वाले हमारे राजनीतिज्ञों को क्यों जरूरत है इतने महंगे आवास की? क्यों नहीं आम आदमी का आवास उनके लायक होता है?

महत्वपूर्ण सवाल है यह, लेकिन कोई भी राजनीतिक दल इसे उठाने को तैयार नहीं, क्योंकि सब जानते हैं अच्छी तरह कि राजनीति में आने का एक बहुत अहम लाभ होता है आलीशान सरकारी मकान दिल्ली-मुंबई जैसे शहरों में मिलना। इन शहरों में आवास की समस्या इतनी गंभीर है कि बड़े उद्योगपति भी मुंबई में रहते हैं छोटे फ्लैटों में, मध्यवर्गीय लोग धारावी जैसी झुग्गी-बस्तियों में और गरीब आदमी के लिए फुटपाथ पर दो गज जमीन भी मिलना महंगा पड़ता है। फुटपाथ पर रहने वाले पुलिस को हफ्ता अदा करते हैं। लेकिन उनके सांसद-विधायक आवास की समस्याओं से बिलकुल बेखबर, क्योंकि उनके बसेरे होते हैं आलीशान सरकारी कोठियों और ऊंची इमारतों में। देश के करदाता देते हैं उनके आवास के पैसे और ऊपर से उनके लिए उपलब्ध करवाते हैं सस्ती दामों पर बिजली, पानी और रिहायशी सुविधाएं। मैं जब भी किसी राजनीतिक दोस्त से पूछती हूं कि उनको क्या बुरा नहीं लगता गरीब जनता के पैसों से इस तरह रहना, तो अकसर जवाब मिलता है कि ऐसा तो हर देश में होता है। यह झूठ है दोस्तो, सरासर झूठ। पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों में सरकारी आवास का कोई प्रावधान नहीं होता, सिवाय प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति के। जन प्रतिनिधियों के लिए सरकारी आवास उपलब्ध कराने की परंपरा हमने शुरू की तत्कालीन सोवियत संघ और चीन जैसे कम्युनिस्ट देशों की नकल करके। उन देशों में इंकलाब आने के बाद राजा-सम्राट खत्म कर दिए गए थे और उनके महलों में बस गए थे माओ, लेनिन, स्टालिन जैसे इंकलाबी नेता। हमारे यहां तो कोई इंकलाब नहीं आया, लेकिन स्वतंत्रता मिलने के बाद हमारे समाजवादी राजनेता उन मकानों में बस गए, जो अंगरेज आला अधिकारी खाली कर गए थे। उस समय के लिए ऐसा करना शायद सही था, लेकिन आज के दौर में इस परंपरा को जिंदा रखना किसी तरह से सही नहीं हो सकता। सो मंदी के इस मौसम में मेरी तरफ से विनम्रता से सुझाव है कि घड़ियाली आंसू बहाने के बदले नेताजी कुछ असली चीज करके दिखाएं, जिसको देखकर जनता खुश हो जाए और सरकारी खर्चे भी कम हो जाएं-खाली करो अपने मकान और बंद करो यह पुरानी प्रथा।

नजरिया

यकीन मानिए, दूसरा कोई  भी लोकतांत्रिक देश नहीं है दुनिया में, जहां जनता खुद बेघर है, झुग्गी-बस्तियों में रहने के लिए मजबूर है, लेकिन अपने राजनीतिक प्रतिनिधियों के लिए वह उपलब्ध कराती है महलों जैसे घर।

तवलीन सिंह

Sunday, June 3, 2012

Save civilians in Syria - Amnesty International Australia

The ruthless massacre of civilians in Houla marks a new low in the Syria crisis. But a massive, renewed international spotlight is our best hope to stop the bloodshed
Save civilians in Syria - Amnesty International Australia