Friday, August 29, 2014

क्योकि एक मे "स्लीपर सेल" तो दूसरे मे "सबसे शक्तिशाली तबका को सडक पर आना और सबसे प्रभावशाली को पीछे गोली मारना" है न असहनीय..

मित्रो ! HOLIDAY और SINGHAM RETURNS समिक्षको को अच्छा नही लगा, क्योकि एक मे "स्लीपर सेल" तो दूसरे मे "सबसे शक्तिशाली तबका को सडक पर आना और सबसे प्रभावशाली को पीछे गोली मारना" है न असहनीय...
उनके लिए जो PRO-active for outstanding merit man क्लब के मानद सदस्य है, वे उतने सभ्य और पोषित है कि छिंक आने पर भी अपनी outstanding merit को नही भूलते, गरिमा बनी रहे. लगी, नही तो आगे पढे उनकी सम्भावनाओ के आगे कुंठित होना लाज़मि है नही तो .........लिफ्ट, प्राइवेट कार्यालय यथा कही भी टूटना तो पडता ही है....

The ugliness of poverty-गरीबी की कुरूपता, say-say bro, whats....

Appeal to friend, who have sympathy, apathy and empathy - and work for them. firstly make sandwich of both and chew it. have guts to do it. many are work for eliminate that but not in honesty way for both side effect-less. 
The ugliness of poverty-गरीबी की कुरूपता, 
The two main reasons, this remains ( दो मुख्य कारणो से यह कायम है )
say-say bro, whats......
my opinion - 1. be used every time on democratic festival. 2. The ugliness of poverty mindset that our status is forever, then why we change former stage - we are always same. No body delete ugliness of poverty, not this time - nor that time.............., only in records
मेरी राय - 1 लोकतांत्रिक त्योहार पर हर बार इस्तेमाल किया जाना. 2 हम पूर्व अवस्था बदल क्यों हमारी स्थिति तो हमेशा के लिए है,गरीबी की कुरूप मानसिकता - हम हमेशा एक ही हैं. कोई मिटा या हटा नही सकता, न इस बार - और न ही उस समय .............. केवल रिकॉर्ड में

आज कोई भी अपने को एक वर्ण का नही कह सकता, सम्भव है मित्रो - देखने कि कोशिश की...”बन्धुत्व हो, शिक्षित हो व शिक्षित करो और हमेशा संघर्षशील रहो”

आज कोई भी अपने को एक वर्ण का नही कह सकता, वर्ण आधारित कर्म और कर्म आधारित वर्ण के आधार पर कम से कम मै तो नही कह सकता, मेरे द्वारा की गयी कर्मो मे चारो “वर्ण आधारित कर्म और कर्म आधारित वर्ण” कि कर्तव्य और जिम्मेदारी सम्मलित है. चाहे वह कोई हो बिना चारो का अस्तित्व का व्यक्ति ढूंढ पाना मुश्किल है. इस मुश्किल के कारण कई सम्भावनाए पैदा हुयी है – “जाति आधारित जन्म या जन्म आधारित जाति” का अस्तित्व मुश्किल मे आ जायेगा ! कई मठाधीशो को रोजी-रोटी की अन्य व्यवस्था अपनानी पडेगी ! जातिगत संगठन और जाति विरोधी संगठन का अस्तित्व खतरे मे होगी ! समाज नूतन अंगडाई लेगी और समरसता तथा सामंजस्य को बढावा मिलेंगी ! हुनर को सम्मान और पहचान होगी ! आरक्षण और पैरवी कि जरूरत नही, (पर निष्पक्ष चुनाव और सभी के लिए भागीदारी व हिस्सेदारी का खुला मंच हो )! अतीत कि भूलो कि सही पहचान और उसकी रोकथाम कि उचित व्यवस्था कि जायेगी ! कई विद्वान और स्थापित संगठन नाखुश होंगे, व्यक्ति आधारित विचारधारओ का ह्रास होंगा और यथार्थ तथा अनुभव आधारित समाज कि पहचान होंगी ! व्यक्ति केवल अपने और परिवार से उपर उठकर समाज को देखना शुरू करेंगा ! – यही से स्वार्थहीन, अमर्यादाहीन, अराजकताविहिन और संकुचित सोच विहिन समाज का वातावरण का मंच बनायी जाने लगेगी !


सम्भव है मित्रो - देखने कि कोशिश की...”बन्धुत्व हो, शिक्षित हो व शिक्षित करो और हमेशा संघर्षशील रहो”

Monday, July 14, 2014

कलयुग के पहले लोग अपने वचन से बंधे रहते थे।

कलयुग के पहले लोग अपने वचन से बंधे रहते थे।
इसीलिए धार्मिक पांडव को अधर्मियों के साथ लम्बा युद्ध करना पड़ा और कई अप्रिय और यश-रहित मार्ग अपनाने पर मजबूर होना पडा। पहले धर्मं का अनुसरण होता था निर्वाहन होता था। अब ज्यादा नफ़ा नुकसान देख कर संवहन किया जाता है।

Saturday, July 5, 2014

Please read...., why? Do You Have A Business Model?

Please read...., why?  Do You Have A Business Model?
In this world there are so many passionate people who is doing great work for society with pure intention without thinking of sustainability and business model or revenue plan. They have sacrificed their career and LIFE to create some value in this world. It's sad part that instead of encouraging such Gandhi's in today's world ,still our society and people are asking same questions.
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Friday, July 4, 2014

समाज के अगुओ को फोकस इन सभी कि ओर होनी चाहिए।

पंथ संघर्ष के इस दौर में होना यह चाहिए की पहले सनातन कि उचित और सही तथ्यों व विचारों से समाज में सही व्याख्या को प्रस्तुत किया जाए। तब अपने आप वर्तमान संघर्ष साकारात्मक रूप में स्थिर होंगा। क्योकि पन्थाचार्यो का योगदान स्वामी विवेकानंद जी के बाद सनातन हेतु नागान्य ही समझे। जितनी मुह उतनी हठ और वैसा ही बजरामूठ की तरह पकडे हुए अनुयायी और अगुआ। हमे बताये वाह जी वाह।।
समाज के अगुओ को फोकस इन सभी कि ओर होनी चाहिए।


Come ! We also come in this category ? बह रहे बयारो का अनुभव रोज़ होता है, और बस शिशकिया दिल से निकलती है

Come ! We also come in this category ?


कर्णधारो से हमेशा अपेक्षा रही कि बन्द करो, लेकिन हमे क्या मालूम उससे रोजी-रोटी जुडी है.. ! बस यही चुप हो जाना पडता है कि बूरा न लगे उनको, क्योकि कल वे हमारे कुछ काम आये ?
इसके बाहर जीना मुश्किल है......, बह रहे बयारो का अनुभव रोज़ होता है, और बस शिशकिया दिल से निकलती है तथा दिमाग गहरी सोचमे....!