Friday, February 4, 2011

ये तो पत्‍थर तोड़ते थे, पुलिस ने इन्‍हें क्‍यों तोड़ा


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ये तो पत्‍थर तोड़ते थे, पुलिस ने इन्‍हें क्‍यों तोड़ा
समय Feb 03, 2011 | एक टिप्पणी दें

लेनिन रघुवंशी

मेरा नाम रघूलाल, उम्र-23 वर्ष, पुत्र-श्री बिंदा बिंद। मैं गाँव-सागर सेमर, पोस्ट-हिनौती, थाना-पड़री, जिला-मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश) का निवासी हूँ। मैं पत्थर तोड़ने का काम करता हूँ, महीना में 10-15 दिन काम मिलता है। हमारे परिवार में चार सदस्य हैं-मैं और मेरी पत्नी उर्मिला, दो लड़का-लवकुश (3 वर्ष) व आशीष (1 वर्ष)।

हमारे साथ जिंदगी में यह पहली घटना घटी जिससे मैं शारीरिक व मानसिक रूप से क्षमता विहीन हो गया। उस घटना के कारण घर से बाहर निकलने में डर लगता है। अब काम-काज करने का हिम्मत ही नही करता। हमेशा चिन्ता व डर बनी रहती है कि दुबारा फिर से हमारे साथ अमानवीय व्यवहार व मार-पीट न किया जाए। इसलिए किसी से बातचीत करने में भी डर लगता है।

पुरवा हवा चलने पर पूरे शारीर में दर्द उठने लगता है, अब परिवार का भरण-पोषण करना मुश्किल हो गया है। रात में जब नींद टूट जाती है तो फिर नींद ही नही आती. सारी रात यह सोचते-सोचते कट जाती है कि जो मेरे साथ हुआ उससे अच्छा मर जाना ही उचित था।

हुआ यह कि मैं 28 मई, 2009 को अपने ससुराल साले जी की शादी में ग्राम-बहरामागंज, पोस्ट व थाना-चुनार, जिला-मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश) गया था। 29 मई को लगभग 10 बजे रात में हम बाजार से ससुराल (घर) चलने वाले थे कि चुनार थाना के जीप पर सवार वहाँ के दरोगा व सिपाही आये, हमें उठाकर गाड़ी में बिठा लिया। अचानक इस हरकत से मैं घबरा गया। रात का समय था, डर के मारे मैं उनसे कुछ पूछ भी नही सका। चोरी हुई जगह और मेरे घर घुमाते-फिराते थाना में लगभग 2.00 बजे रात में पहुँचे। उस समय 2 बल्ब दरोगा के कमरे में तथा तीन बाहर में जल रहे थे। हवालात में बल्ब नहीं था। हमें उसी हवालात में बंद कर दिया गया। कुछ समय बाद दो रोटी और सब्जी हमें भोजन के लिये दिया गया। अभी भोजन किये ही थे कि हमें फिर दो सिपाही हथकड़ी लगाकर बाहर लाये और जीप में बिठा दिया, यहाँ से वे लोग हमें सुदर्शन दरोगा के आराम करने वाले कमरे पर ले आये. वहाँ पर पहले से ही थाना से सम्बन्धित दो लोग उपस्थित थे। यहाँ से जीप में बिठाकर वे पाँचों लोग हमें डगमगपुर स्थित एक फैक्ट्री के पास ले गये और हमें डराते व धमकाते हुये पूछा कि बताओं तुम्हारे साथ कौन-कौन लोग थे। वह एक सुनसान क्षेत्र है. रात में पूरा सुन-सपाटा छाया हुआ था। डर के मारे पुरा शरीर पसीना से लथपथ हो गया था. डर लग रहा था कि कही मारकर फेंक न दे। आज भी वह दिन याद करके रोंगटे खड़े हो जाते हैं। डराने व धमकाने के लगभग आधे घंटे बाद चुनार चौकी के समीप ही बिहारी ढ़ाबा है, वहाँ ले आये. अपने लिये वे लोग चाय मंगवाये और हमें कांच की गिलास में दारू पीने के लिये दिया। हमने कभी शराब नहीं पी थी. जब हमने शराब पीने के लिये मना कर दिया, तब गाली देते हुए सिपाही आया व मारने लगा और दूसरा सिपाही जबरदस्ती मुँह में लगाकर हमें दो गिलास शराब पिला दिया। उस समय हम मर जाना उचित समझते थे और यह ठीक भी रहता। शराब पिलाने के बाद उसी समय और लोगों के घर छापा मारा गया तथा 12 लोगों को पकड़ा। उसमें से कई लोग हमारे गांव व इलाके के रहने वाले थे।

30 मई, 09 को दिन में लगभग 12 बजे दरोगा हमें अपने दफ्तर में बुलाया तथा हमारे साथ मार-पीट करने लगा, हमारी दायां हथेली पर कुर्सी रखकर उस पर बैठ गया तथा बोला कि बताओ डकैती का समान कहाँ है, कौन-कौन से लोग इसमें शामिल हैं। हम बेकसुर थे. हम कुछ नही जानते थे. इसलिए हमने कुछ नहीं बोला., तब दरोगा ने सिपाहियों को बुलाया, सिपाही हमें कमरा के बाहर लाये तथा कम्पाउड में डंडे से पिटाई करने लगे तथा चोरी का हामी भरा रहे थे। सर छोड़कर पूरे शरीर पर आगे-पीछे, बेरहम की तरह पिटाई करने लगे. जिससे दांये हाथ के अंगूठा में जबरदस्त चोट आई, जो आज तक सूजा हुआ है। कुर्सी से कुचलने के कारण हथेली के ऊपरी हिस्से पर निशान अभी भी है तथा सूजा हुआ है। उस समय तो हम डर गये थे कि हथेली का हड्डी टूट गया है, लेकिन एक्स-रे करवाने पर पता चला कि हड्डी नहीं टूटी है, तब जाकर थोड़ा राहत महसूस हुआ। मार-पीट के बाद वे लोग हमें हवालात में डाल दिये। दिन भर हमें खाना भी नही दिया. शाम को 4 बजे घर से खाना आया तब खाना खाये। उसी दिन लगभग डेढ बजे रात में फिर सुदर्शन दरोगा अपने निवास पर बुलाया. कहा कि झूठ या सच कुछ तो बताओ? वहाँ पर हमें लगभग डेढ घंटे रखा. उसके बाद सिपाही को बुलाया तथा हमें थाना ले जाने को बोला। वहीं पर सिपाही ने हमें दो डंडे मारे तथा जीप में बिठाया. जीप में हमें मारते हुए थाने ले आया। हवालात के सामने लगातार डंडे की बारिश हमारे ऊपर करने लगे. जब हम गिर गये तब हवालात में 15 कैदियों के साथ बंद कर दिया। रात में खाना भी नहीं दिया।

अगले दिन फिर दरोगा अपने कार्यालय में बुलाया तथा थाना परिसर में रखी पत्थर पर बैठने को बोला, जो चारो-ओर से बिजली के तार से घिरा हुआ था. बैठने के बाद हमें दो बार बिजली का करेंट लगाया और करेंट देने लगा। उसी समय मेरा भाई ओम प्रकाश समोसा लेकर आया था. होमगार्ड ने उसे समोसा देने से मना किया तथा बोला कि इसके लिए चना और लाई लेते आओं। जब भाई खाने का समान दे रहा था, उस समय हम केवल इतना बोले कि हमें पानी-पिला दो, अब जिंदगी का कोई पता नही। उसने हमें पानी पिलाया। इसके बाद हमें तीसरी बार करेंट दिया, जिसके कारण हम बेहोश हो गये।

पाँच दिन बाद जब हमें होश आया, अपने को मैं सरकारी जिला अस्पताल मिर्जापुर में लेटा पाया. यह देखकर हम अचम्भित हो गये। हाथ के इशारा से मैंने अपने जीजा जी से पूछा, तब वे बोले कि आपकी हालत खराब हो गई थी, इसलिए आपको भर्ती किया गया है। दो दिन तक हमें कुछ याद नहीं रहा। बाद में धीरे-धीरे पता चला कि हमारे साथ पुलिस वाले क्या-क्या किये हैं।

सप्ताह भर हम अस्पताल में रहे, उसके बाद घर आये। पुलिस वाला हमें पूछने तक नहीं आये। बाद में हमें पता चला कि लोगों ने चुनार व डगमकपुर के चौराहे पर चक्का जाम किया था. पडरी थाना के दरोगा जी व क्षेत्रीय विधायक भी हमसे अस्पताल में मिलने आये थे। अखबार वाले भी आये थे, जिन्होंने हमारी हालात व चुनार दरोगा के मनबढ़ी व अत्याचार पर खबर अखबार में छापे थे। बंदी के दौरान चुनार के दरोगा सुदर्शन हमारे ससुर श्री लक्ष्मण व भाई (जीतू) से 13,000 रुपये हमें छोड़ने के एवज् में लिया था।

मिर्जापुर अस्पताल में भर्ती होने के पहले हमें चुनार क्लिनिक में भर्ती करवाया गया था, जहाँ डाक्टरों ने हमारी स्थिति नाजूक देखते हुए मिर्जापुर जिला अस्पताल भेजने को बोला था। तब क्षेत्रीय विधायक जी के कहने पर एम्बुलेंस से मिर्जापुर अस्पताल लाया गया था. वहां हमारा सर व हाथ का एक्स-रे भी हुआ था।

बायीं तरफ पीछे की हिस्सो में दर्द अभी भी है। हमारे घर से पुलिस जो समान उठाकर ले गई थी, वह मिल गया है, लेकिन जो समान पटेल परिवार ले गये जैसे-हसुली पायल, बल्ला: नहीं मिला है।

मारपीट का याद आने पर मर-जाना उचित लगता है। अभी जब हम आपके कार्यालय आ रहे थे, तो बगल वाली जो मंदिर है वहाँ पुलिस को देखकर अंदर से सहम गये थे, मेरा मुँह सुखने लगा था।

जब से अस्पताल से आये हैं, घर छोड़कर कहीं नहीं जाते, एक-दो बार केवल दवा-ईलाज हेतु बाबू जी के साथ ही गये हैं। अपनी कहानी कहने व सुनाने के बाद डर पैदा होता है। दोषी पुलिसकर्मियों पर कार्यवाही हो. जिससे वह भी सीख लें कि नाजायज व गैर कानूनी तरीकों से आम आदमी के साथ इस तरह से अमानवीय ढ़ंग से मार-पीट व गाली गलौज न करें। पटेल परिवार जो हमें डकैती में फँसाया है, उसे भी दण्ड मिले।

आपको कहानी सुनाकर व यहां आकर धीरे-धीरे अब डर कम होने लगा है। गाँव व क्षेत्र में मेरी कहानी पढ़ी जाए। मार-पीट के कारण जो इज्जत गयी है, वह लौट तो नहीं सकती, लेकिन सभी हमारी कहानी को जाने कि पुलिस कैसे बेगुनाह के साथ अमानवीय व्यवहार करती है। दुनिया जाने की पुलिस का असली चेहरा क्या है तथा अखबार एवं समाचार में मेरा कहानी पढ़ा एवं प्रसारण किया जाय। अभी जब आपने हमारी कहानी पढ़कर सुनायी, हमें बहुत अच्छा लगा तथा अब पहले से बेहतर व अच्छा महसूस कर रहा हूँ.

उपेन्द्र कुमार से बातीचत पर आधारित

डॉ0 लेनिन रघुवंशी 'मानवाधिकार जन निगरानी समिति' के महासचिव हैं और वंचितों के अधिकारों पर इनके कामों के लिये इन्‍हें 'वाइमर ह्युमन राइट्स अवॉर्ड', जर्मनी एवं 'ग्वांजू ह्युमन राइट्स अवॉर्ड', दक्षिण कोरिया से नवाज़ा गया है. लेनिन सरोकार के लिए मानवाधिकार रिपोर्टिंग करेंगे, ऐसा उन्‍होंने वायदा किया है. उनसे pvchr.india@gmail.com पर संपर्क साधा जा सकता है.
Tags: police attrocity, UP

Wednesday, February 2, 2011

पुलिसिया यातना की शिकार की ख़ुदबयानी,

पुलिसिया यातना की शिकार की ख़ुदबयानी


पुलिसिया यातना की शिकार की ख़ुदबयानी
समय Feb 02, 2011 |
लेनिन रघुवंशी
मेरा नाम रीना (बदला हुआ नाम), पत्नी श्री विनोद कुमार गुप्ता, मकान नं0-137, मोहल्ला-सिपाह, थाना-कोतवाली, जौनपुर की निवासनी हूँ। मेरे पति शादी के पहले से ही ड्राइवरी का काम करते हैं। 24 जनवरी को लगभग 4.30 से 5.00 बजे भोर में पुलिस आयी और मेरे पति विनोद को ले गयी। उस वक्त में अपने बेटे को गोद में ली थी और वो अपने पापा को बुला रहा था। उस समय मुझे लगा कि हमारे ऊपर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा है, मुझे कोई रास्ता नही सुझ रहा था कि क्या करें। मैं रोने-पीटने लगी। मैने यह सोचा कि पुलिस घटना की पुछ-ताछ करके छोड़ देगी। लेकिन पति के वापस न आने के बाद मेरा और मेरी अम्मा (सास) की हालत खराब हो गयी। मेरे अम्मा जी तो बार-बार बेहोश हो जा रही थी। दोपहर में आस-पड़ोस के लोग इकठ्ठा हुए और सात्वना दी और कह कि इतना सीधा लड़का कहा फँस गया और उन लोगो ने सलाह दी कि सेठ जी से बात करने पर शायद सब ठीक हो जाये। मेरी अम्मा इसी आस में सेठ जी के घर जाकर उनके हाथ जोडे़ और पैर भी छुए, सेठ ने कहा कि अब आप लोग राम-राम करें।

वापस फिर 12 फरवरी, 2010 को 10 बजे रात सेठ SOG को लेकर हमारे घर पर आये और घर में रखे तीन मोबाइल को अपने कब्जे में ले लिया। पुलिस ने हमारे कमरे के पूरे समान को चेक किया। मैने एक छोटे से पर्स में पायल और लगभग 3000 से 4000 रुपये बचाकर रखे थे। उनके जाने के बाद सुबह मैने पर्स देखा तो पर्स में सिर्फ पायल मिला और मेरे पापा ससुर और पति को ले गये।

10 मिनट बाद दोबारा फिर आये ‘‘यह बात बताने में कांप जा रही हूँ। उस समय मैं घर में बिल्कुल अकेली थी। मेरी अम्मा और देवर, बड़े पापा (मेरे ससुर के भाई) को घटना की जानकारी और बुलाने गयी थी। उस समय मुझे अकेला देखकर एक पुलिस वाला मेरे साथ बदतमीजी करने लगा और मुझे गन्दी-गन्दी गाली देने लगा। जब वह मेरा पास आया तो उसके मुँह से शराब की बदबू आ रही थी।

मार के डर से मेरे पति ने कहा कि उसने रिवॉल्वर घर में एक अमरूद के पेड़ के नीचे छिपाया है। वापस पुलिस मेरे पति को लेकर रिवाल्वर खोजने के लिए खुदाई शुरू की। उसी बीच फिर वही खड़ा एक पुलिस वाला मेरे पास आकर फिर से बदतमीजी करने लगा और मेरी अम्मा से बार-बार कहने लगा कि तुम्हे टॉयलेट जाना है तो जाओ। वह मेरी सास को बहुत गाली दिये और लगातार जूते की नोंक से चार-पाँच बार मारे। मुझे गाली देकर कहा कि ‘‘तुम्हे यही मिला था शादी करने के लिए’’ और मेरी अम्मा से पुछा कि कहां से लायी है इसे। सरायमीर का नाम सुनते कि उसने मेरी इज्जत को तार-तार करते हुए कहा कि इसके ऊपर न जाने कितने मुसलमान चढ़े होगे।

इसके बाद उन लोगो ने मेरी अम्मा को भी अपमानित किया ‘इतना बदमाश लड़का पैदा करने के लिए तु तो चार-पाँच लोगो के पास तो गयी होगी। यह भी कहा कि तुम्हारे गुप्तांग में ऐसा मारेगे कि तुम्हारी बच्चेदानी बाहर आ जायेगी। इतना कहते हुए उन लोगो ने हमारी साड़ी खीचने की कोशिश की। प्रतिरोध करने पर उन लोगों ने हमारी अम्मा को वापस जूते की नोंक से मारा और धमकी दी कि तुम्हारे खानदान में किसी को नही छोड़ूंगा। सबको बेइज्जत करूँगा।
मेरे पति के सामने कहा कि तुम्हारी बीवी को यही तुम्हारे सामने सुलाकर शारीरिक सम्बन्ध बनाऊँगा। उस समय मुझे लगा कि अपनी इज्जत बचाने के लिए कहा भागे, कोई रास्ता सुझ नही रहा था। इस बात को याद कर अभी भी डर लगता है और खुद से शार्म महसूस होती हैं। उन लोगों ने मेरे पति को बच्चे की कसम दिलायी कि मेरे घर में कुछ नहीं है और फिर मेरे पति को कमरे में ले जाकर बेड पर सुलाकर सीने पर बहुत मारा, मार की आवाज बाहर तक आ रही थी। वे लोग मेरी अम्मा और देवर को ले जा रहे थे, मुझे भी चलने को कहॉ, मैने कहा कि मेरा बच्चा सो रहा है तो उन लोगो में मुझे छोड़ दिया।

मेरा एक बच्चा तीन साल का है और दूसरा अभी गर्भ में है। अभी यही चिन्ता रहती है गुजारा कैसे होगा, 18 फरवरी को पुलिस ने मेरे पति को छोड़ दिया। हम लोग को यह डर है कि सेठ फिर से हमारे घर न आये और दोबारा इस तरह से गाली-गलौज और मार न सहना पड़े। अभी खाने पीने में बिल्कुल मन नही करता है। अभी घर में कोई काम काम करने वाला नही है। इस घटना के बाद देवर और ससूर का काम भी छुट गया है।

डर के कारण मेरे परिवार के सभी सदस्य एक ही जगह सोते हैं। मेरे पति इतने डरे हुए हैं कि टायलेट भी अकेले नहीं जाते हैं। मेरे पति और अम्मा को रात में नींद नहीं आती है, आती भी है तो नींद में ही अम्माँ-अम्माँ चिल्लाने लगते है। पुलिस मेरे पति को लेकर मेरे बहन के घर आजमगढ़ गयी और मेरे पति से बोला कि तुम भागो, तुम्हारा इनकाउन्टर कर देगे।

पुलिस इनको लेकर मेरे मामा, भाभी और सभी रिश्‍तेदारों के यहां लेकर गयी और उन्हें धमकाया भी। अभी यह लगता है कि न्याय मिल जाये और वापस हम लोग खुशी से अपना जीवन व्यतीत कर सकें। इस घटना के बारे में बताकर अन्दर से काफी हल्का महसूस कर रहे हैं। अपनी व्यथा आप लोगों से बांट कर थोड़ा अच्छा लग रहा है।

रेणू और शबाना से बातचीत पर आधारित

डॉ0 लेनिन रघुवंशी 'मानवाधिकार जन निगरानी समिति' के महासचिव हैं और वंचितों के अधिकारों पर इनके कामों के लिये इन्‍हें 'वाइमर ह्युमन राइट्स अवॉर्ड', जर्मनी एवं 'ग्वांजू ह्युमन राइट्स अवॉर्ड', दक्षिण कोरिया से नवाज़ा गया है. लेनिन सरोकार के लिए मानवाधिकार रिपोर्टिंग करेंगे, ऐसा उन्‍होंने वायदा किया है. उनसे pvchr.india@gmail.com पर संपर्क साधा जा सकता है.

http://www.scribd.com/doc/48025065/Police-Jail-personnel-again-despoiled-humanity-in-India-PVCHR-RCT-Varanasi


Tuesday, February 1, 2011

http://www.sarokar.net/2011/01/मुसहर-जीवन-से-एक-साक्षात्/


http://www.sarokar.net/2011/01/मुसहर-जीवन-से-एक-साक्षात्/

मुसहर जीवन से एक साक्षात्‍कार
समय Jan 27, 2011 | 3 टिप्पणियाँ

डॉ लेनिन रघुवंशी

उत्तर प्रदेश के वाराणसी जनपद में बड़ागाँव ब्लॉक के मुसहर परिवारों की कहानी, समाज को उच्च शिखर पर पहुँचा रहा है, क्या आपको लगता है? आइये ज़रा महसूसने की कोशिश करें …

बड़ागाँव नाम से ही लगता है कि कितना विकसित होगा और कितना सुशोभित होगा यहाँ के नागरिकों का जीवन। मगर ये वास्तविकता से परे है। आज भी मुसहरों की स्थिति दयनीय है और उपेक्षाओं की मार से धरती पर कीड़े-मकोड़ों की तरह जीवन-जीने को मजबूर हैं। ऐसा लगता है कि जुल्मों-सितम को सहते हुए इसे नियति समझ बैठे हों। दिन की शुरुआत होती है, लेकिन यह पता नही रहता कि शाम तक बच्चों के लिए दो जुन की रोटी का जुगाड़ हो पायेगा कि नही। उस स्थिति में बच्चों के लिए शिक्षा तो दूर एक वक्त का भोजन मिल जाए यही सौभाग्य मानते हैं। प्राथमिक विद्यालय व आँगनबाड़ी की स्थिति आज भी मनुवादी सोच को चरितार्थ कर रही है।

एक तरफ राज दावा कर रही है कि जल्द ही हमारे प्रदेश में गाँव-गाँव तक चिकित्सा वाहन की सुविधा हर एक दलित बस्ती में पहुँचेगी, मगर वास्तविकता क्या है? अस्पताल के बाहर गर्भवती महिला तड़पते हुए अपने बच्चों को खो दे रही है, पीड़ा को दूर किये बिना उसके साथ छूआछूत का बर्ताव किया जा रहा है। क्या उनका इस जाति में जन्म लेना दुर्भाग्य है कि वो मुसहर जाति में पैदा हुई है। अगर कभी-कभार ए0एन0एम0 (सरकारी स्वास्थ्य सेविका) डिलिवेरी करवा देती है तो उस महिला के साथ पशुओं से भी ज्यादा अभद्र व्यवहार होता है और महिनों की कमाई की जमा पूँजी उल्टे ऐंठ ली जाती है।
ग़रीबी व भूखमरी मानों सदियों से इनको दरिद्रतापूर्ण जीवन जीने के लिये बेबस कर दिया हो। उत्तर प्रदेश कुपोषण और भूखमरी के शिकार बच्चों की स्थिति में अव्वल है जिसमें मुसहर जाति के बच्चे ज्यादा पाये गये है।

यातना और संगठित हिंसा का शिकार यह जाति किसी भी समय उच्च जातियों और पुलिस द्वारा उत्पीड़ित होते है, इनके लिए न्याय पाना तो दूर ये गुहार भी नहीं कर सकते, ऐसी यहाँ सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था कायम है।

पुलिस द्वारा मुसहरों से घृणित कार्य करवाना मानों अब आदत सा बन गया है कि रात्रि-अर्द्धरात्रि, जब चाहे घर में घुसकर उठा लें और सड़ी गली लावारिश लाश फेंकवाना, थाने और जेल में आज भी शौचालय साफ करवाना व गंदी-गंदी वस्तुओं को जबरन उठावाना इत्यादि शामिल है।

उच्च जातियों द्वारा अपने यहां बेगारी करवाकर मजुदूरी न देना और समुदाय के महिलाओं के साथ छेड़छाड़ व असामाजिक दुर्व्‍यवहार आम बात है। अगर कभी इस समुदाय के लोग साफ़ कपड़े पहनकर रिश्‍तेदारी के लिये भी घर से निकलें और इन पर दबंग जातियों का नजर पड़ जाए तब जान-बूझकर जबरन काम करवाया जाता है ताकि इनके कपड़े मैले हो जाएं। लेकिन चुनाव की गर्माहट है तो मुसहर देवता, नहीं तो धोबी का कुत्ता बना रहता है। यही इनकी नियति है।

धर्म व जाति को प्रधानता देना लोगों द्वारा ढकोसला व मूर्खतापूर्ण असामन्जस्य फैलाने वाली समस्या अपने देश के लिए बतायी जा रही है। मगर वास्तव में ये एक व्यवसाय सा प्रतीत होता है जिससे कभी दबंगों, कभी पुलिवालों और कभी वकीलों का ही जेब भरता नजर आ रहा है।

हमारे देश में सदियों से चला आ रहा है कि स्त्री पूज्‍य है उसकी पूजा-अर्चना करनी चाहिये। कुछ समय पहले ही इस वक्तव्य को धूमिल होते देख हमारे संविधानदाता अनेक कानून व धारायें बनाकर चले गये। आज भी प्रत्येक शासनकाल में स्त्रियों की स्थिति में सुधार हेतु कुछ न कुछ योजनायें व आरक्षण की सुविधा महिलाओं को दी जा रही हैं। लेकिन क्या वो क्रियान्वित हो रहा है? या फिर केवल भाषणबाज़ी की संस्कृति बनकर रह जा रहा है। इसको भी हम यहाँ इस विशालकाय गाँव में अवलोकित होते हुए देख सकते हैं। पुरुष-महिला को अपनी जागीर समझता हैं। पंचायतीराज को ही ले सकते हैं कि जिसमें महिला प्रधान होने पर भी सारे कर्ताधर्ता पुरुष ही रहते हैं। महिला को ये भी पता नहीं रहता कि उनका दायित्व क्या है और हमारा निर्वाचन क्यों हुआ हैं। आखिर वो जाने कैसे? जब घर में चकला-बेलन ही चलाना है। जब कभी एकाध बार कोई ग़रीब व वंचित महिला बगावत कर घर के दहलीज़ को पार करती है, तो पुरुषरूपी घड़ियाल उसको अपने क़ब्जे़ में करने के लिए हर तरह के पैतरे अपनाता है। ये ज़रूरी नहीं कि उसका हथियार केवल पुरुषवादी सोच ही काफी है बल्कि वक्त पड़ने पर एक स्त्री के लिए स्त्री का इस्तेमाल कर लेते है। इस व्यवस्था में मुसहर महिलाओं की स्थिति सोची जा सकती हैं। खुले आम अनुसूचित जाति/अनुसूचित जाति अधिनियम व निवारण एक्ट की धज्जियॉ उड़ रही है। अस्पृष्यता उन्मूलन एक लम्बा संघर्ष है। जब हमारे ग्रामीण समाज की गंदी सोच ही दर्शन बन जाये तो हमारा संविधान व कानून मात्र केवल कागज की कठपुतली ही बनकर रह जायेगा। जिसे हम केवल अच्छे दर्शक की तरह देखेगें और एक गंभीर व प्रशंसनीय चित्रकथा की भाँति अपने मस्तिष्‍क के अवचेतन भाग के ऊपर छोड़ देगें। ऐसी स्थिति में इस समुदाय का क्या होगा?

अंततः हम यही कह सकते हैं कि ये केवल बड़ागाँव के मुसहरों की कहानी नहीं है बल्कि आज देश में यह जाति जहां भी है वहाँ ये कुरूतियाँ व्याप्त हैं। क्या अब भी हम यहीं कहेगें कि समाज सर्वोच्च शिखर पर पहुँच रहा है। उत्तर प्रदेश उत्तम प्रदेश बन गया है?

डॉ0 लेनिन रघुवंशी 'मानवाधिकार जन निगरानी समिति' के महासचिव हैं और वंचितों के अधिकारों पर इनके कामों के लिये इन्‍हें 'वाइमर ह्युमन राइट्स अवॉर्ड', जर्मनी एवं 'ग्वांजू ह्युमन राइट्स अवॉर्ड', दक्षिण कोरिया से नवाज़ा गया है. लेनिन सरोकार के लिए मानवाधिकार रिपोर्टिंग करेंगे, ऐसा उन्‍होंने वायदा किया है. उनसे pvchr.india@gmail.com पर संपर्क साधा जा सकता है.

Thursday, January 27, 2011

Government will be forced to release my son, says Binayak's mother


http://www.sify.com/news/government-will-be-forced-to-release-my-son-says-binayak-s-mother-news-national-lbvuOvchehh.html


Kolkata, Jan 21 (IANS) Welcoming the active and vocal support of rights bodies for Binayak Sen's immediate release, his mother Friday exuded confidence that the collective demand of well-wishers will force the government to release him.

'Several rights bodies across the country are demonstrating and demanding my son's immediate and unconditional release. I do believe that all their efforts will collectively stimulate a wave upon the government to release Binayak,' Anusua Sen told IANS over phone.


A day before Christmas, the Raipur district and sessions court found Binayak Sen, 59, and vice-president of the People's Union for Civil Liberties, guilty of sedition and links with Maoists. He was sentenced to life imprisonment, drawing widespread condemnation including from Amnesty International.


'I still have some faith within myself that they (governments) will not be able to keep him behind bars for long, but we have to wait for some more time,' Anusua said.


She also said that her family was looking forward to Jan 24, when the hearing for his bail petition is likely to be held at Chhattisgarh High Court.


'We are all waiting for the outcome of the hearing. I would have liked to be physically present, but my younger son and Binayak's wife Illina asked me to stay back because of my ill health,' she added.


The bail petition was filed earlier this month.

Wednesday, January 26, 2011

Release Sudhir Dhawale:Please do needful for Dalit also



http://www.facebook.com/l/a4468CnAA-fn9ZGYIXkf6VL0BgQ%3Bwww.pvchr.net/2011/01/release-sudhir-dhawaleplease-do-needful.html

PVCHR stongly condems the detention of dalit activist Sudhir Dhawale & demands his release immedietly. This act of govt. again proves that india is uppercaste hindu state and discrimination based on caste, religion and gender is order of the day.It is not only maharastra govt, who has done this inhuman act, but all of india's picture is same... Let us be united against brahminical fascism to make india a democratic state .


sudhir dhawale protesting against the binyak sen verdict

Terming the arrest of Dalit activist Sudhir Dhawale as suppression of freedom of speech and the Dalit movement, a group of activists have demanded his release.

Home minister RR Patil has ordered an independent review by an inspector general followed by further action in the next 8 days.

Working in the tribal and naxal-hit areas in the backwards districts of Vidarbha, Dhawale was arrested by Gondia police under the Unlawful Activities (Prevention) Act and charged with sedition.

The social and Dalit movement activists have formed a 'Sudhir Dhawale Release Movement' that would raise voice overhis arrest in at least 8 districts in the next few days. The movement has the support of noted activist and documentary film maker Anand Patwardhan, Prakash Reddy, Anandraj Ambedkar, writer Urmila Pawar, Pratima Joshi. They were the part of the group that met the home minister.

They claimed that the police have falsely implicated Dhawale. "He was arrested under the charge of sedition, the charges under which freedom fighters were arrested by Britishers decades ago. He was arrested because he possessed the books related to Marxism and Maoism," said Patwardhan.

here are few links:
1.http://www.facebook.com/l/71306p7E5YgLN5aErIhkdVCZYIQ;www.dnaindia.com/mumbai/report_activists-rally-for-sudhir-dhawale-s-release_1491305

2.http://www.facebook.com/l/71306vWFcx4p6LFVwb1rJfQGY9A;www.mumbaimirror.com/index.aspx?page=article§id=2&contentid=20110104201101040202095098109b7de